Thursday, 11 February 2021

चमोली ग्लेशियर त्रासदी के लिए क्या चीन जिम्मेदार है? मेजर सरस त्रिपाठी का विश्लेषण

07 फरवरी 2021 को जो कुछ भी चमोली में हुआ उसके विषय में आप लोग अभी तक अच्छी तरह से जानते होंगे। लेकिन क्या आपने सोचा कि यह चीन द्वारा कृत्रिम रूप से किया हुआ कुकृत्य हो सकता है? नहीं ना? लेकिन हां संसार के बड़े-बड़े बुद्धिजीवी इस विषय पर विचार कर रहे हैं? भारत सरकार भी इस विषय में सशंकित है परंतु अपने विचार व्यक्त नहीं कर रही है? Wadia Institute of Himalyan Geology के निदेशक कलाचन्द सांई ने इस दुर्घटना पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि यह फरवरी में कैसे हो सकती है। केन्द्रीय जल आयोग के निर्देशक शरद चन्द्र ने भी इस दुर्घटना के समय पर आश्चर्य व्यक्त किया है। आज (09 फरवरी 2021) में The Hindu में प्रकाशित एक लेख में उन्हें उद्धृत करते हुए कहा गया है कि एकाएक ऐसा होना आश्चर्यजनक है जबकि हर 24 घंटे सेटेलाइट इमेज की समीक्षा होती है और एक दिन पूर्व ऐसे कोई लक्षण दिखाई नहीं देता। कनाडा के कालगेरी विश्वविद्यालय के जिओमारफोलाजिसट डाक्टर डैन शुगर भी इसे काफी रहस्यमय मानते हैं।
आर्मी के भूतपूर्व ऑफिसर मेजर (रि) सरस त्रिपाठी
आज से कई महीने पहले मैंने एक पोस्ट लिखा था जिसकी लिंक भी यहां दे रहा हूं जिसमें मैंने भारत के एक अत्यंत खतरनाक हथियार #काली/ KALI (Kilo Ampere Linear Injector) के विषय में बताया था। तब तक यह माना जाता था कि काली सिर्फ भारत और अमेरिका के पास है। किंतु चीन इस विषय पर बहुत गंभीरता से रिसर्च कर रहा था और क्योंकि चीन के पास संसार की अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी है, ऐसी संभावना है कि उसने काली जैसा कोई हथियार बना लिया है। काली यानी किलो एंपियर लीनियर इंजेक्टर। यह अत्यंत शक्तिशाली लेजर बीम है जो ग्लेशियर को बिना किसी आवाज या विस्फोटक को लगाए सर्जिकल सूक्ष्मता (surgical precision) से काट सकती हैं। इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा कि ग्लेशियर क्या कभी सर्दियों में भी खिसक सकते हैं ग्लेशियर और हिमालयन स्टडीज के जितने भी विशेषज्ञ हैं उनमें से किसी को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि फरवरी के महीने में जब बर्फ चट्टान की तरह एक दूसरे से चिपकी रहती है, उस समय ग्लेशियर कैसे टूट सकता है? आमतौर पर ग्लेशियर के खिसकने की घटनाएं अप्रैल-मई के बाद होती हैं जब उत्तरी गोलार्ध में गर्मी का आगमन हो जाता है या गर्मी पड़ने लगती है। इस समय तो लगभग प्रतिदिन यहां घनघोर हिमपात होता रहता है तो ऐसे समय में ग्लेशियर कैसे टूट सकता है। ग्लेशियर का तापक्रम -50 से -70 (माइनस 50-70) डिग्री सेल्सियस होता है। इतनी बृहत चट्टानें जो एक दूसरे से इतनी सघनता से जुड़ी हुई है कैसे टूट सकते हैं।

तो क्या इसमें चीन का हाथ है? हां इसकी बहुत प्रबल संभावना है। उसके कारण नीचे दिए जा रहे हैं:

1.भारत ने 2018 काली का प्रयोग करके सियाचिन ग्लेशियर के उस हिस्से को काट दिया था जिसके नीचे पाकिस्तान सेना का एक बटालियन हेडक्वार्टर था। परिणामस्वरूप पूरा का पूरा बटालियन हेड क्वार्टर, जिसमें लगभग 135 लोग थे, ग्लेशियर के नीचे दब कर मर गए थे। उन्हें यह भी समझ में नहीं आया था कि यह सब कैसे हुआ हो सकता है। विदेशी विशेषज्ञों ने इसका आरोप भारत पर लगाया था और कहा था कि भारत ने काली का प्रयोग कर ग्लेशियर को काट दिया जिससे वह टूटकर के नीचे चले गए और पूरे के पूरे बटालियन हेड क्वार्टर को नष्ट कर दिया। शंका है कि चीन ने इसी तकनीक का प्रयोग कर उत्तराखंड में इस त्रासदी का षड्यंत्र किया है।

2. दूसरा चीन से अधिक पानी की शक्ति को दुनिया में कोई भी देश पहचान नहीं पाया है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि चीन के पास दुनिया में सबसे अधिक बांध (Dam) है चीन के पास लगभग 22000 बड़े बांध है और लगभग 58000 छोटे बांध है। दूसरे नंबर पर बांधों की संख्या में अमेरिका आता है जिसके पास लगभग 75,000 बांध है। चीन पानी की शक्ति से भारत के बड़े हिस्से को डुबाने की स्थिति में है क्योंकि भारत आने वाली अधिकतर नदियों का उद्गम तिब्बत में है जो इस समय चीन के कब्जे में है। अकेले ब्रह्मपुत्र पर उसने इतने बड़े-बड़े बांध बनाए हैं कि अगर वह इस जल को छोड़ दें तो संभवतः संपूर्ण उत्तर पूर्व और पूर्वी भारत डूब सकता है। दुनिया के सबसे बड़े और खतरनाक बांध जैसे three gorges dam जो कि यांगत्सी नदी पर बना हुआ है, चीन में ही है।

3. चीन के दो राष्ट्रपति हाइड्रोलॉजिस्ट रहे हैं, और अधिकतर इंजिनियर।। इस विषय पर मैंने विस्तृत निबंध लिखा है जो मेरी आने वाली पुस्तक का हिस्सा है परंतु विस्तार के कारण इसको यहां नहीं लिखा जा सकता। चीन के यह दोनों राष्ट्रपति हैं: वेन जिआबाओ और हुन जिंताओ।
इन्होंने जल किस शक्ति को समझा और जल शक्ति के विकास पर बहुत अधिक ध्यान दिया। यही कारण है कि चीन आज संसार की सबसे बड़ी जल शक्ति है चाहे वह बांधों का निर्माण हो, हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर का उत्पादन हो या जल को नियंत्रित कर नदियों के डाउनस्ट्रीम में उनका एक रणनीतिक उपयोग करने की विद्या हो। चीन से अधिक निपुणता और निहित शक्ति (skill and potential) किसी देश में नहीं है।

4. चौथा कारण यह है कि जहां पर यह ग्लेशियर टूटा है वह चीन की सीमा के बिल्कुल निकट है । रक्षा विशेषज्ञों ने पहले ही इस बात की संभावना व्यक्त की थी कि यदि चीन तिब्बत में यानी लद्दाख क्षेत्र में भारत के साथ कुछ ज्यादा नहीं कर पाता तो वह अरुणाचल या किसी अन्य क्षेत्र में नए मोर्चे खोल सकता है। यह चीन के नए मोर्चा खोलने का एक हिस्सा लगता है। बिना एक भी सैनिक के उसने भारत के अरबों-खरबों रुपए का नुकसान किया है। तपोवन में बन रहा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट पूरी तरह से तबाह हो गया है। पहले से ही निर्मित एक बांध पूरी तरह से बह गया है। 200 से अधिक लोगों के मर जाने की संभावना है। चीन की गणना में यह एक बहुत बड़ी तबाही हो सकती थी लेकिन डाउन स्ट्रीम खाली होने के कारण उसने इस जल प्रवाह को अपने में समाहित कर लिया। परिणामस्वरूप जो त्रासदी ऋषिकेश, हरिद्वार और उसके आगे मैदानी इलाकों में हो सकती थी वह कम हो गई। 

चीन ने ऐसा करके अपने बहुत सारे उद्देश्यों को पूरा किया है। एक, उसने भारत को बहुत ही अनपेक्षित नुकसान पहुंचाया है। दो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चार धाम सड़क परियोजना के ऊपर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्यावरणविद लोगों को काफी मसाला प्रदान कर दिया है। चीन का उद्देश्य है कि भारत के अंदर ही सरकार का अधिक से अधिक विरोध हो। चीन नहीं चाहता कि चारधाम परियोजना के अंतर्गत सड़के बने क्योंकि यह हमारे लिए रणनीतिक महत्व की भी है। तीसरा उसने यह दिखा दिया है कि वह युद्ध सिर्फ सेना, गोला-बारूद, हथियार, मिसाइल और हवाई जहाज से ही नहीं, जल से भी लड़ सकता है।

लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश के अधिकतर लोग इन बातों को नहीं समझते। बहुत से लोग तो अति उत्साह में बस चिल्लाना शुरू कर चुके हैं कि यह पेड़ काटने से हुआ है, बांध बनाने से हुआ है और सारी परियोजनाएं रोक देनी चाहिए। ऐसे लोग न सिर्फ मानसिक मोतियाबिंद (mental myopia) से ग्रस्त हैं बल्कि दुश्मनों अनजाने ही एक सहयोग प्रदान कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण भी महत्वपूर्ण है और संभव है कि यह घटना प्राकृतिक हो। परंतु यह चीन की जल रणनीति का यह एक हिस्सा भी हो सकता है। 

नोट- ये लेख मेजर (रि) सरस त्रिपाठी जी की फेसबुक वॉल से साभार लिया  गया है। प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं। 

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